my tukbandi

हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

Rose Day Special Love Poem: बिन कांटों के गुलाब हैं...



बिन कांटों के गुलाब हैं,
लब उसके लाजवाब हैं.

उन गुलाबी प्यालों में,
मीठी सी कोई शराब है.

चांदी जैसे मुखड़े पर,
दो हीरे बड़े नायाब हैं.

निशा बसे है ज़ुल्फ़ों में,
माथे पर माहताब है.

इश्क़ में डूबी नज्मों की,
अनपढ़ी सी किताब है.

ऐसे उसके हुस्न पर,
सादगी का हिज़ाब है.

दीद हुआ है जबसे राजू!
दिल की हालत ख़राब है.



दोस्तों! अगर कविता पसंद आई हो तो 'my tukbandi' को facebook पर like जरूर कीजियेगा:

लब=ओंठ, अधर; निशा=रात; माहताब=चन्द्रमा; नज्म=कविता की एक शैली; हिज़ाब=पर्दा; दीद=नजारा, दिखाई देना.