my tukbandi

हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

A Poem about Pains associated with A Night † सुबकता रहा चांद रातभर...



सुबकता रहा चांद रातभर,
सिसकती रही हवाएं रातभर,
करहाते रहे पहाड़ रातभर,
चीखती रही दिशाएं रातभर.

शायद कोई सपना था.

मगर सुबह मैनें देखा...

शबनम बिखरी हुई थी हर पात पर,
ज़रूर आसमान रोया होगा रातभर.


 -Rajendra Nehra


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